Sunday, 31 March 2013

दुनिया बड़ी कमाल की

 

दुनिया बड़ी कमाल की, कहते हैं सब गोल।
रिश्ते हों या प्रेम हो, सबका लगता मोल।
सबका लगता मोल, हुई हर बात दिखावा
सतही मन इंसान, बन गया एक छलावा।
ओढ़े हुए नकाब, फिर रहे ज्ञानी गुनिया
कहे 'कल्पना' गोल, बड़ी अद्भुत यह दुनिया।

दुःख-सागर जो मानते, दुनिया को इंसान।
खुद जोड़े उसने सभी, व्यर्थ साज-सामान।
व्यर्थ साज-सामान, दुःखों का बोझ बढ़ाते
बरबादी की ओर, कदम फिर बढ़ते जाते।
भरते अपने हाथ, कुटिल कर्मों की गागर
दुनिया को नादान, कहें फिर दुःख का सागर। 

जब तक दुनिया में रहें, क्रियाशील हों अंग।
अगर यंत्र इक बन गए, लग जाएगी जंग।
लग जाएगी जंग, स्वत्व ही खो जाएगा
कर्म-कोश नाकाम, एक दिन हो जाएगा।
निर्भर होंगे मीत, मशीनों पर ही कब तक?
क्रियाशील हों अंग, रहें दुनिया में जब तक।

नज़र उठाकर देखिये, कुदरत के वरदान।
पाएँगे दूरान्त तक, दुनिया स्वर्ग समान।
दुनिया स्वर्ग समान, दिया दाता ने इतना।
रंग-रूप, रस-गंध,  लुटाएँ चाहें जितना
कहनी इतनी बात, जिएँ हर पल मुस्काकर
दुनिया स्वर्ग समान, देखिये नज़र उठाकर।


-कल्पना रामानी 

4 comments:

shashi purwar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (17-04-2013) के "साहित्य दर्पण " (चर्चा मंच-1210) पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
सूचनार्थ...सादर!

expression said...

बहुत सुन्दर कुण्डलियाँ कल्पना जी...
सादर
अनु

दिगम्बर नासवा said...
This comment has been removed by a blog administrator.
तुषार राज रस्तोगी said...

बहुत सुन्दर रचना |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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