Thursday, 25 August 2016

मेरा देश महान


धरा बचाओआजकल, छिड़ा खूब अभियान।
पौधे रोपे जा रहे, गली, सड़क, मैदान।
गली, सड़क, मैदान, जोश लेकिन दो दिन का।
जब तक बने न पेड़, कीजिये पोषण उनका।
कहे कल्पना मित्र, जागरण ज्योत जगाओ
होगा तब अभियान, सफलतम धरा बचाओ


पावन धरती देश की, कल तक  थी बेपीर।
कदम कदम थीं रोटियाँ, पग पग पर था नीर।
पग पग पर था नीर, क्षीर पूरित थीं नदियाँ
हरे भरे थे खेत, रही हैं साक्षी सदियाँ।
सोचें इतनी बात, आज क्यों सूखा सावन?
झेल रही क्यों पीर, देश की धरती पावन।

कोयल सुर में कूकती, छेड़ मधुरतम तान।
कूक कूक कहती यही, मेरा देश महान।
मेरा देश महान, मगर यह सुन लो हे नर!   
काट-काट कर पेड़, हमें अब करो न बेघर
कहनी इतनी बात, अगर वन होंगे ओझल।
कैसे मीठी तान, सुनाएगी फिर कोयल। 

-कल्पना रामानी

Wednesday, 24 August 2016

जन्में थे नंदलाल

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी  के लिए चित्र परिणाम
कथा सुनाते वेद हैं, वह था द्वापर काल।
कृष्ण भाद्रपद अष्टमी, जन्में थे गोपाल।
जन्में थे गोपाल, रात आधी थी तम की
भू पर आए ईश, मिटाने छाया गम की।
यह दिन पावन मान, पर्व सब लोग मनाते
वह था द्वापर काल, वेद हैं कथा सुनाते।

कहते पर्व प्रधान है, भारत देश विशाल।
कृष्ण जन्म का पर्व भी, मनता है हर साल।
मनता है हर साल, झाँकियाँ जोड़ी जातीं
हर चौराहे टाँग, मटकियाँ फोड़ी जातीं।
मोहन माखनचोर, स्वाँग में बालक रहते
भारत देश विशाल, धाम पर्वों का कहते।   

कहने को पटरानियाँ, थीं मोहन की आठ।
सोलह हज़ार रानियों, संग अलग थे ठाठ।
संग अलग थे ठाठ, मगर ये सब कन्याएँ
बतलाता इतिहास, कहाईं वेद ऋचाएँ।
असुरों से उद्धार, किया इनका मोहन ने
मुख्य रानियाँ आठ, यही वेदों के कहने।

मोहन मथुरा चल पड़े, तजकर गोकुल ग्राम।
हुई अकेली राधिका, दीवानी बिन श्याम।
दीवानी बिन श्याम, गोप, गोपी सब रोए।
भूखा सोया गाँव, नयन भर नीर भिगोए।
सूना यमुना तीर, ग्वाल, गाएँ, मुरली बिन
नन्द यशोदा क्लांत, हुए सूने बिन मोहन।  

कृष्ण जगत का मूल है, नहीं सिर्फ अवतार।
अर्जुन का यह सारथी, गीता का यह सार।
गीता का यह सार, भक्ति का भाव यही है
युद्ध नीति का नाम, काल असुरों का भी है। 
आकर्षण, चातुर्य, ज्ञान, गुण स्रोत सुमत का
नहीं सिर्फ अवतार, मूल है कृष्ण जगत का।   


-कल्पना रामानी

Monday, 2 May 2016

गर्मी करे विहार

 
गर्मी में देखो सखी, तरणताल का जोश। 
लोहा लेने धूप से, खोला राहत-कोश। 
खोला राहत-कोश, जानता है यह ज्ञानी
जल निगले जब काल, उसे बनना है दानी। 
कितना सखी उदार, ताल यह सेवाकर्मी
बनकर शीत फुहार, हर रहा जन की गर्मी।

जब-जब आकर भूमि पर, गर्मी करे विहार
मित्रों तब उसका करें, मनचाहा सत्कार
मनचाहा सत्कार, सुराही जल भर लाएँ
फल सलाद के साथ, दही का पात्र सजाएँ
जो माँगे तर खाद्य, परोसें सारे जी भर
गर्मी करे विहार, भूमि पर जब-जब आकर

उद्यत होता सूर्य जब, तड़पाने मन-प्राण
न्यौता देते तब हमें, सुबह-शाम उद्यान
सुबह-शाम उद्यान, सौंपकर खुशबू-छाया
सहज सुखाते स्वेद, अजब कुदरत की माया
फूलों का परिवार, हमारा सौख्य सँजोता
तड़पाने मन-प्राण, सूर्य जब उद्यत होता  

दिनकर के सखि देखकर, अतिशय गरम मिजाज   
हमें बुलाते दूर से, दे पहाड़ आवाज़
दे पहाड़ आवाज़, प्रकृति का लुत्फ उठाने
चल पड़ते हैं पाँव, भ्रमण पर इसी बहाने
पर्वत शीतल-स्नेह हमें देते तब जी भर 
जब-जब गरम-मिजाज सखी होता है दिनकर 

-कल्पना रामानी   

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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